गुरुवार, 26 नवंबर 2009

प्रेम -3

.....चाहे वो लैला-मजनू का हो या फिर शिरी-फरहाद का या मीरा का हो या राधा का ,इससे कोई फर्क नही पड़ता की दो व्यक्ति में प्रेम है या एक व्यक्ति और परमात्मा में प्रेम है ,प्रेम एक ही है
प्रेम टूटता है ? टूटता ही नही तो जोड़ने का सवाल ही नही उठता जिनसे मैंने प्यार किया है ,वो कभी नही टुटा ,इसलिए जोड़ने का कोई कारन ही नही जिनका प्रेम टुटा वो भ्रम में थे की वो प्रेम था ,उन्होंने किसी अलग चीज़ को ही प्रेम समझा ,लोभ को प्रेम समझा
आप किसीको कहते हो की मै तुमसे प्रेम करता लेकिन आप गहराई से सोचना प्रेम के बारेमे उसमे कुछ न कुछ पाने की तमन्ना है ,जिस्म पाने की चाहत ,धन पाने की इच्छा ,रुतबा पाने की तमन्ना कुछ न कुछ पाने की आकांक्षा है कही न कही वासना छिपी हुई है ,और जहा वासना है वहा प्रार्थना नही !जहा लोभ है वहा प्रेम नही
लेकिन हमारा प्रेम लोभी ही होता है
दिल भर जन चाहिए ,और दिल तभी भर आने की संभावना होती है जहा कोई वासना नही होती ,कोई इच्छा नही होती
ऐसे लोग है दुनियामे जिन्होंने सब कुछ दाव पे लगा दिया है वो प्रेमी है ,उन्होंने प्यार को समझा है ,बिनशर्त प्रेम किया है ,"जियेंगे साथ और मरेंगे साथ "
मेरे साथ रहना सस्ता नही है बहोत ही महँगा सौदा है
मुझे कवि ये बात नही जची "टूटे से फिर न जुड़े " टूटता ही नही है आजतक का अनुभव है की कभी नही टुटा और जो टुटा वो प्रेम था ही नही तो जोड़ेंगे तो गाठा पड़ेगा ही ना ,लेकिन ये धागा ऐसा थोड़े ही है जो टूटेगा
प्रेम एक अदृश्य धागा है ,बहोत ही तरल ,नाजुक एक हवा के झोके से भी टूटने वाला लेकिन तलवार से भी नही टूटता ......
क्रमश:................