मंगलवार, 3 अगस्त 2010

यही है जिंदगी

आज पता नहीं दिल की धड़कन इतनी क्यू तेज चल रही है

दिल खाली -खाली सा लग रहा है ,बैठे बैठे आँखोमे आँसू आ गए है और थमने का नाम ही नहीं ले रहे है .सिसक के रो रहे है हम ,अकेलेपन का एहसास बहोत ही दर्द देता है हम जानते है इसे हमे सेहन करना है ,फिर भी ये कमबख्त आँसू आ ही जाते है क्यू ???? नहीं है जवाब हमारे पास, या हम दे नहीं सकते ,ये भी एक बड़ा सवाल है क्या यही जिंदगी है शायद इसीलिए किसीने कहा है

"ये जीवन है, इस जीवन का

यही है, यही है,यही है

रंग रूप थोड़े गम है थोड़ी खुशिया

लेकिन सच तो ये है की,गम ही गम है ,ख़ुशी कही नजर ही नहीं आती हर वक़्त समजौता करना पड़ता है क्यों करे हम ये हमेशा क्या सीधी -सधीअपनी तरीकेसे ये जिन्दगी नहींजी सकते हम ????????????????????????जिन्दगी के थोड़े ही लम्हे बाकि है जो हम बिना किसी गम के और बिना किसी समजौते के जीना चाहते है ....... क्या ये मुमकिन है ????????????

'

4 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Bina samjhaute ke to mumkin hai,bina gamke kahan?(Jyoti,'samjaute'ke badle 'samjhauta' kar lo,theek?Tatha 'baaqee'!)
Tumharee ye tasveer badi pyari hai!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

waah, bahut badhiyaa

दीपक 'मशाल' ने कहा…

एक गीत ऐसे समय में बहुत याद आता है जब मन में ऐसी कोई कविता उपजती है जैसी कि आपने सृजित की ज्योति जी..
''राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है.. दुःख तो अपना साथी है.. सुख तो है एक छाँव घनेरी आती जाती है.. दुःख तो अपना साथी है...''

Ish ने कहा…

sahi hai sahi hai jidgi ka ye roop